लेखनी कहानी -24-Mar-2024
होलाष्टक के दिनों में शुभ कार्य न करने का वैज्ञानिक कारण
होलाष्टक के दिनों में शुभ कार्य करने हेतु सिर्फ धर्म ही नहीं वरन विज्ञान की दृष्टि से भी वर्जित है। यदि हम वैज्ञानिकों की मानें तो होलाष्टक विज्ञान, प्रकृति और मौसम के बदलाव से जुड़ा हुआ है। इन दिनों में मानसिक और शारीरिक संतुलन न होने के कारण शुभ और मांगलिक काम करने की मनाही है। क्योंकि इन दिनों हम शारीरिक और मानसिक रूप से खिन्न रहते हैं । मौसम में बदलाव के कारण हममें से ज्यादातर लोग अव्यवस्थित और अस्वस्थ हो जाते हैं।इन दिनों वातावरण में बैक्टीरिया, वायरस अधिक सक्रिय होते हैं। सर्दी से गर्मी की ओर जाते इस मौसम में शरीर पर सूर्य की पराबैंगनी किरणें विपरीत प्रभाव डालती हैं। होलाष्टक के समय में साइट्रिक एसिड युक्त फलाें का सेवन ज़्यादा करना चाहिए और गर्म पदार्थों का सेवन कम कर देना चाहिए। इसके साथ ही होलिका दहन पर जो अग्नि निकलती है वो शरीर के साथ- साथ आस- पास के बैक्टीरिया, वायरस और नकारात्मक ऊर्जा काेे समाप्त कर देती है। क्योंकि होलिका को जलाने में जो गाय के गोबर से बने कंडे, पीपल, पलाश, नीम, रेड़ी और अन्य पेड़ों की लकड़ियों का प्रयोग किया जाता है इससे निकलने वाला धुआंँ वातावरण को बैक्टीरिया और वायरस रहित तथा शुद्ध करने में कारगर होता है।
यदि हम चिकित्सकों की मानें तो इन दिनों में मौसम के साथ- साथ शरीर में भी बदलाव होते हैं जिसके फलस्वरूप शरीर में विद्यमान हार्मोंस और एंजाइम्स में भी परिवर्तन होते हैं। मूड स्विंग होने लगता है। जिसके फलस्वरूप हमारे मानस पटल में अचानक और तेजी से बदलाव आता है। जिसके फलस्वरूप हम किसी एक पल के लिए खुश होते हैं और दूसरे ही क्षण अचानक मायूस हो जाते हैं। चिकित्सकीय या वैज्ञानिक भाषा में इसे एक तरह का जैविक विकार/ बायोलॉजिकल डिसऑर्डर माना गया है, जिस पर काबू पाना कठिन कार्य होता है। सेक्सुअल हार्मोंस के कारण शारीरिक और वैचारिक बदलाव भी होने लगते हैं। मौसम के बदलने से हार्ट और लीवर पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।
अतः यदि हम चिकित्सा विज्ञान की मानें तो होली से 8,10 दिन पूर्व से हमें अपनी दैनिक दिनचर्या और खान-पान पर बड़ा ही ध्यान देना चाहिए ।जरा सी भी लापरवाही हमें शारीरिक और मानसिक रूग्णता का शिकार बना सकती है।
साधना शाही, वाराणसी